कटारिया गोत्र का इतिहास / History

विक्रम सम्वत 1021, में सोनगरा चौहान जातीय रतनसिंह जी नामक एक प्रसिद्ध राजपूत थे ! आपने अपने नाम से रतनपुर नगर बसाया था ! आपकी पांचवी पीढ़ी में धनपाल जी नाम के एक नामांकित राजा हुए ! सुप्रसिद्ध जैनाचार्य दादा जिनदत्तसुरीजी के द्वारा राजा धनपाल ने जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण की तथा श्रावक के बारह गुण सुनकर अंगीकार किये, तभी से आपके रतनसिंहजी के नाम से रतनपुरा कहलाने लगे !

इन्ही रतनसिंह जी के वंश में आगे जाकर झांझणजी नामक एक प्रतापी और बुद्धिमान पुरुष हुए ! आपकी वीरता से प्रसन्न होकर मांडलगढ़ के बादशाह ने आपको अच्छे ओहदे पर मुक़र्रर किया था आपने शत्रुंजय तीर्थ के लिए संघ भी निकाला था ! किवदंती है की शत्रुंजय तीर्थ पहुँचने पर आरती की बोली पर शाह अमीरचंद नामक एक नामी साहूकार के साथ आपकी प्रतिस्पर्धा हो गयी !आरती की बोली बढ़ते बढ़ते लाखो रुपयों तक पहुँच गयी और अंत में झांझणजी ने मालवा प्रदेश की 92 लाख की आमदनी की बोली इस पर लगाकर प्रभु की आरती उतारी, आपके दूसरे भाई पेपड़ शाह ने शत्रुंजय गिरनार पर ध्वजा चढ़ाई और कई धार्मिक कार्य किये !इसके पश्चात किसी के चुगली करने पर एक समय बादशाह झांझणजी पर बहुत अप्रसन्न हुए और उन्हें पकड़ने के लिए सेना भी भेजी और बादशाह भी गए ! झांझणजी के हाथ में कटार होने पर बादशाह ने उन्हें कटारिया नाम से सम्बोधित किया और खजाने से रुपये चुराने का आरोप लगाया ! झांझणजी ने जवाब दिया " हुज़ूर, मैं एक पैसा भी बेहक़ का खाना हराम समझता हूँ, हाँ हुज़ूर के जग ज़ाहिर नाम को खुदा तक पहुंचाने का नेक काम ज़रूर किया है !इस उत्तर से प्रसन्न होकर बादशाह ने आपके सब गुनाहो को माफ़ कर दिया और आपको दरबार में भी कटार रखने का सम्मान प्रदान किया , तभी से आपके वंशज कटारिया कहलायें ! आज कटारिया गोत्र के परिवार देश के मुख्यतः राजस्थान , मध्य-प्रदेश , महाराष्ट्र , गुजरात , कर्नाटक , तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र-प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में निवास कर रहे है ! कटारिया परिवार के सदस्य मुख्य रूप से व्यापार में संलग्न है !

नाडोल नगरी माँ कुलदेवी आशापुरा माताजी का पाटस्थान कहते है ! माँ की भक्ति करने से घर में सुख शांति , समृद्धि , व्यापार वृद्धि एवं कृपा प्राप्त होती है !